पी.ए.यू. एवं खेतीबाड़ी विभाग ने किसानों को नरमा फसल प्रबंधन की दी वैज्ञानिक सलाह

 पी.ए.यू. एवं खेतीबाड़ी विभाग ने किसानों को नरमा फसल प्रबंधन की दी वैज्ञानिक सलाह

   पंजाब कृषि विश्वविद्यालयलुधियाना के कुलपति डॉएसएसगोसल, खेतीबाड़ी एवं किसान भलाई विभाग , पंजाब के निदेशक डॉजीएसबराड़प्रसार शिक्षा निदेशक डॉएमएसभुल्लर तथा मुख्य कृषि अधिकारीफाजिल्का डॉकुलवंत सिंह के दिशा-निर्देशों के तहत पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के फार्म सलाहकार सेवा केंद्रअबोहर के वैज्ञानिकों एवं खेतीबाड़ी  विभाग की टीमों द्वारा जिले के नरमा क्षेत्र में नरमा तथा अन्य खरीफ फसलों संबंधी किसान प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। साथ ही नरमा फसल का नियमित सर्वेक्षण भी किया जा रहा है। इसी क्रम में गांव धर्मपुरा तथा किल्लियांवाली में किसान प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए गए।

        इन प्रशिक्षण शिविरों में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के फार्म सलाहकार सेवा केंद्रअबोहर की ओर से डॉजगदीश कुमार अरोड़ा एवं डॉमनप्रीत सिंह तथा खेतीबाड़ी  विभाग की ओर से डॉगगनदीप सिंहडॉदिनेश कुमार एवं डॉहरीश कुमार ने किसानों को विभिन्न कृषि विषयों पर विस्तृत जानकारी प्रदान की।

     डॉमनप्रीत सिंह (फसल वैज्ञानिकने सर्वेक्षण रिपोर्ट एवं वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर बताया कि जिले में नरमा-कपास की फसल की बढ़वार अब तक संतोषजनक एवं सामान्य है। उन्होंने किसानों को उचित सिंचाईसंतुलित उर्वरक प्रबंधन तथा समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने की सलाह दीताकि फसल का समुचित विकास हो सके। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि जिन खेतों में नरमा की फसल 35–40 दिन की हो चुकी हैवहां पहला पानी लगाने के तुरंत बाद यूरिया की पहली किस्त अवश्य डालें। जिन खेतों में सिंचाई की कमी के कारण फसल समय से पहले फूल बनने की अवस्था (स्ट्रेसमें पहुंच गई हैवहां तुरंत सिंचाई करने तथा यूरिया की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करने की सलाह दी।

फार्म सलाहकार सेवा केंद्रअबोहर के प्रभारी डॉजगदीश कुमार अरोड़ा ने बताया कि वर्तमान समय में जिले में नरमा फसल की स्थिति सामान्य एवं संतोषजनक है। उन्होंने रस चूसने वाले कीटों के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि सफेद मक्खी की संख्या फिलहाल नियंत्रण में है तथा इसकी औसत आबादी लगभग 1.5 से 2.0 प्रति पत्ता दर्ज की जा रही है। हालांकिअधिक तापमान एवं उमस के कारण कुछ खेतों में  तेला तथा थ्रिप्स (जूका प्रकोप देखा गया हैजिसके आने वाले दिनों में बढ़ने की संभावना है। इसलिए किसानों को अपने खेतों की नियमित निगरानी करने तथा आवश्यकता पड़ने पर विश्वविद्यालय की सिफारिशों के अनुसार ही कीटनाशी दवाओं का प्रयोग करने की सलाह दी गई।

डॉजगदीश कुमार अरोड़ा ने गुलाबी सुंडी के संबंध में बताया कि सर्वेक्षण के दौरान कुछ स्थानों पर पौधों के फूलों में गुलाबी सुंडी का प्रारंभिक प्रकोप देखा गया है। उन्होंने किसानों से अपील की कि इससे घबराने की आवश्यकता नहीं हैबल्कि जहां भी इसका प्रकोप दिखाई देवहां इसके प्रथम जीवन चक्र को तोड़ने के लिए अनुशंसित कीटनाशकों का समय पर छिड़काव करें। इसके लिए प्रोक्लेम (एमामेक्टिन बेन्जोएट 5% एस.जी.) 100 ग्रामक्यूराक्रॉन (प्रोफेनोफॉस 50% .सी.) 500 मि.ली., डेलीगेट (स्पिनेटोराम 11.7% एस.सी.) 170 मि.ली., अथवा फेम (फ्लूबेंडियामाइड 480 एस.सी.) 40 मि.लीप्रति एकड़ की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई।

उन्होंने किसानों को गुलाबी सुंडी की नियमित निगरानी के लिए प्रति एकड़ 1–2 फेरोमोन ट्रैप लगाने की भी सलाह दी। यदि किसी ट्रैप में प्रतिदिन 1–2 पतंगे पकड़ में आने लगेंतो इसे गुलाबी सुंडी के सक्रिय प्रकोप का संकेत मानते हुए तुरंत अनुशंसित कीटनाशकों के छिड़काव का निर्णय लेना चाहिए।

 इस अवसर पर खेतीबाड़ी विभाग के डॉहरीश कुमार ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card), मिट्टी एवं सिंचाई जल की जांच तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के महत्व के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने किसानों से समय-समय पर अपनी मिट्टी एवं पानी की जांच करवाकर उसी के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करने का आग्रह किया।

 

  खेतीबाड़ी विभाग के डॉगगनदीप सिंह एवं डॉदिनेश कुमार ने विभाग द्वारा किसानों के हित में चलाई जा रही विभिन्न योजनाओंअनुदान कार्यक्रमों तथा कृषि विकास संबंधी सुविधाओं की विस्तृत जानकारी देते हुए किसानों से इन योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने की अपील की। उन्होंने बताया कि कृषि विभाग किसानों को आधुनिक खेती अपनानेसंसाधनों के संरक्षण तथा उत्पादन लागत कम करने के लिए निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन एवं सहयोग प्रदान कर रहा है। 

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