ज़मीन से सितारों तक: वॉचमैन की नौकरी और धनिया बेचने से लेकर बॉलीवुड के 'नवाब' बनने तक नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का अकल्पनीय सफर
12 साल के कड़े संघर्ष और अटूट हौसले की सबसे प्रेरणादायक सच्ची कहानी
धनिया बेचने और चौकीदारी करने वाले नवाज़ुद्दीन ने अपने अटूट संघर्ष से बॉलीवुड के सबसे दमदार अभिनेता का मुकाम पाया।
मुंबई की मायानगरी के बारे में कहा जाता है कि यह शहर हर रोज़ हज़ारों सपने देखता है, लेकिन हकीकत में उनमें से कुछ ही पूरे हो पाते हैं। जब बात बॉलीवुड की आती है, तो एक समय था जब 'हीरो' का मतलब गोरा रंग, अच्छी कद-काठी और सिक्स-पैक एब्स हुआ करता था। लेकिन इस परिभाषा को पूरी तरह से बदलकर रख देने वाले अभिनेता का नाम है— नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी।

आज नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी बॉलीवुड के उन गिने-चुने अभिनेताओं में से एक हैं, जो सिर्फ अपने नाम और अपने दमदार अभिनय के दम पर पूरी फिल्म को हिट कराने की क्षमता रखते हैं। लेकिन उनके लिए उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से निकलकर बॉलीवुड के इस मुकाम तक पहुँचना कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि यह खून-पसीने, लगातार रिजेक्शन और 12 साल के उस कड़े संघर्ष की कहानी है, जो किसी भी आम इंसान को तोड़ कर रख दे।
गाँव की पगडंडियों से लेकर आजीविका का संघर्ष :
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के एक छोटे से गाँव बुढ़ाना में जन्मे नवाज़ुद्दीन का परिवार किसानी करता था। परिवार बड़ा था और संसाधन सीमित। विज्ञान से स्नातक करने के बाद, नवाज़ुद्दीन नौकरी की तलाश में दिल्ली आ गए। यह उनके जीवन का वह दौर था जब पेट पालना सबसे बड़ी चुनौती थी।
दिल्ली में उन्होंने जो नौकरियाँ कीं, वे उनके सपनों से कोसों दूर थीं। गुज़ारा करने के लिए उन्होंने कभी सब्जी मंडी में धनिया बेचा तो कभी एक खिलौना फैक्ट्री में काम किया। बात यहीं तक सीमित नहीं रही; जब पैसों की सख्त ज़रूरत पड़ी, तो उन्होंने एक हाउसिंग सोसाइटी में वॉचमैन (चौकीदार) की नौकरी भी की। नवाज़ुद्दीन खुद बताते हैं कि वॉचमैन की नौकरी के दौरान उन्हें घंटों खड़ा रहना पड़ता था, और कई बार थकान के कारण जब वे बैठ जाते थे, तो सुपरवाइज़र उन्हें डांटता था। एक दिन ऐसा भी आया जब उन्हें इस नौकरी से निकाल दिया गया क्योंकि वे शारीरिक रूप से इस थकान को झेल नहीं पा रहे थे।
लेकिन इसी दिल्ली में उनके अंदर अभिनय का कीड़ा कुलबुलाया। उन्होंने एक नाटक देखा और तय कर लिया कि उन्हें अभिनेता ही बनना है। इसके बाद उन्होंने 'नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा' (NSD) में दाखिला लिया और वहां से अभिनय की बारीकियां सीखीं।
मुंबई का रुख और 1-2 मिनट के रोल्स का दर्द :
साल 1996 में अपनी आँखों में अभिनेता बनने का सपना लिए नवाज़ुद्दीन मुंबई पहुँच गए। लेकिन मुंबई में उनका स्वागत सफलता ने नहीं, बल्कि कड़े रिजेक्शन ने किया। निर्देशकों और निर्माताओं के ऑफिस के चक्कर काटते-काटते उनके जूते घिस गए। उन्हें अक्सर यह कहकर रिजेक्ट कर दिया जाता था कि "तुम हीरो जैसे नहीं दिखते" या "तुम्हारी कद-काठी एक एक्टर वाली नहीं है।"
किराया देने और दो वक्त की रोटी के लिए नवाज़ुद्दीन को जो भी छोटा-मोटा रोल मिला, उन्होंने किया।
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सरफरोश (1999): इस फिल्म में उनका रोल मात्र कुछ सेकंड का था, जहाँ वे एक मुखबिर बने थे।
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शूल (1999): इस फिल्म में वे एक रेस्टोरेंट में वेटर के छोटे से रोल में नज़र आए।
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मुन्ना भाई M.B.B.S. (2003): इसमें उन्होंने एक पॉकेटमार का 1 मिनट का रोल किया, जिसकी पिटाई होती है।
ये वो रोल्स थे जिनमें दर्शक उनका चेहरा ठीक से याद भी नहीं रख पाते थे। कई बार तो फिल्मों से उनके सीन भी काट दिए जाते थे। यह सिलसिला 1 या 2 साल नहीं, बल्कि पूरे 12 साल तक चला। कई बार वे टूट कर वापस अपने गाँव लौट जाना चाहते थे, लेकिन उनके अंदर की ज़िद उन्हें रोक लेती थी।
किस्मत का पलटना: जब 'फैज़ल' ने लिया सबका बदला लगातार कोशिशों के बाद, साल 2010 में आई फिल्म 'पीपली लाइव' से उन्हें थोड़ी पहचान मिली। लेकिन उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई साल 2012 में आई फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर'।
निर्देशक अनुराग कश्यप ने नवाज़ुद्दीन की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें 'फैज़ल खान' का मुख्य किरदार दिया। "बाप का, दादा का, भाई का, सबका बदला लेगा रे तेरा फैज़ल"—इस एक डायलॉग और उनके खूंखार, लेकिन संजीदा अभिनय ने पूरे भारत में तहलका मचा दिया। दर्शकों को एक ऐसा 'हीरो' मिल गया था जो बिल्कुल उनके जैसा दिखता था, लेकिन स्क्रीन पर आते ही जादू कर देता था।
इसके बाद इसी साल फिल्म 'कहानी' में 'इंस्पेक्टर खान' के उनके किरदार ने यह साबित कर दिया कि नवाज़ुद्दीन बॉलीवुड में एक लंबी पारी खेलने आए हैं।

आज का दौर: बॉलीवुड के सबसे दमदार अभिनेता एक समय था जब नवाज़ निर्देशकों के पीछे काम मांगने के लिए भागते थे, आज बड़े-बड़े निर्देशक उनके पास अपनी स्क्रिप्ट लेकर लाइन में खड़े रहते हैं। 'मांझी: द माउंटेन मैन' में दशरथ मांझी का उनका अद्भुत अभिनय हो, 'बजरंगी भाईजान' में पाकिस्तानी रिपोर्टर चांद नवाब का कॉमिक रोल हो, 'रमन राघव 2.0' में एक साइको किलर का किरदार हो, या फिर वेब सीरीज़ 'सेक्रेड गेम्स' में 'गणेश गायतोंडे' का वो रोल जिसने उन्हें ग्लोबल स्टार बना दिया—नवाज़ुद्दीन ने हर बार खुद को साबित किया है।
निष्कर्ष नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की कहानी सिर्फ एक अभिनेता की सफलता की कहानी नहीं है; यह एक इंसान के कभी हार न मानने के जज़्बे की मिसाल है। वॉचमैन की नौकरी में घंटों खड़े रहने वाले पैरों ने आज बॉलीवुड के सबसे ऊंचे शिखर पर अपना मुकाम बना लिया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर आपमें टैलेंट है, और आप अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं, तो न तो आपकी शक्ल-सूरत मायने रखती है, न आपका बैकग्राउंड और न ही आपकी गरीबी।
आज नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी महज़ एक स्टार नहीं, बल्कि अपने आप में 'एक्टिंग का एक स्कूल' बन चुके हैं।


